5 अक्टूबर की कार्य परिषद बैठक में पहले की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव, उच्च न्यायालय के फैसले और एआईसीटीई के स्पष्टीकरण का इंतजार

देहरादून: वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में पांच परिसर संस्थानों के निदेशक पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद और गहरा गया है। 25 सितंबर 2026 को निदेशक पदों के लिए साक्षात्कार संपन्न होने के बाद अब 5 अक्टूबर को प्रस्तावित कार्य परिषद की बैठक के एजेंडे में भर्ती नियमों में संशोधन तथा पहले की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव शामिल किया गया है। इससे भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
विश्वविद्यालय की 5 अक्टूबर को होने वाली कार्य परिषद की 20वीं बैठक के एजेंडे में वर्ष 2023 की 14वीं कार्य परिषद बैठक के बिंदु 14-12 में अनुमोदित निदेशक पद की सामान्य भर्ती नियमावली में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही संशोधित भर्ती नियमावली और निदेशक पद के लिए तैयार विज्ञापन को अनुमोदित कराने तथा पहले की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव भी शामिल है।
साक्षात्कार के बाद नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निदेशक पदों के लिए विज्ञापन जारी हो चुका था, आवेदन लिए जा चुके थे और 25 सितंबर को अभ्यर्थियों के साक्षात्कार भी हो चुके हैं, तो इसके बाद भर्ती नियमों में संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी? साथ ही पहले की जा चुकी कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव क्यों रखा गया?
उच्च न्यायालय में मामला लंबित:
निदेशक पदों की भर्ती को केवल प्रतिनियुक्ति के आधार पर किए जाने को लेकर जनहित याचिका पहले से उच्च न्यायालय में विचाराधीन बताई जा रही है। इस मामले में न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा है। इसके अलावा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद से संबंधित स्पष्टीकरण और निर्देश का विषय भी सामने है।
ऐसे में न्यायालय के निर्णय और संबंधित नियामक संस्था के स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा के बीच कार्य परिषद की बैठक में भर्ती नियमों में संशोधन तथा पहले की कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, केवल किसी प्रस्ताव को बैठक के एजेंडे में शामिल किए जाने से भर्ती प्रक्रिया को अवैध नहीं माना जा सकता। इसकी वैधानिकता का अंतिम निर्धारण सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
साक्षात्कार के बाद नई पसंद कैसे ली जाएगी?
कार्य परिषद के एजेंडे में उल्लेख है कि पांचों परिसर संस्थानों के निदेशक पदों के लिए साक्षात्कार निर्धारित नियमों, विनियमों और प्रक्रिया के अनुसार पूरा किया गया। चयन समिति की संस्तुतियां राज्य सरकार के अनुमोदन के लिए सीलबंद लिफाफे में भेजे जाने की भी जानकारी दी गई है।
एजेंडे के अनुसार साक्षात्कार के दौरान अभ्यर्थियों से प्रत्येक संस्थान के लिए उनकी पसंद भी ली गई थी और चयन समिति ने इन्हीं प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी संस्तुतियां तैयार कीं।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि प्रत्येक परिसर के निदेशक पद के लिए अलग-अलग आवेदन और दो हजार रुपये आवेदन शुल्क लिया गया था, तो साक्षात्कार के बाद अभ्यर्थियों से दोबारा नई पसंद किस नियम के तहत ली जाएगी? क्या इससे मूल विज्ञापन में निर्धारित आवेदन और चयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी?
पांच पदों के लिए छह अभ्यर्थियों का साक्षात्कार:
भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पांच निदेशक पदों के लिए छह अभ्यर्थियों के साक्षात्कार होने की बात सामने आई है। ऐसे में यह भी प्रश्न उठ रहा है कि सीमित संख्या में अभ्यर्थियों के आधार पर चयन प्रक्रिया को किस नियम के तहत अंतिम रूप दिया जाएगा और क्या प्रत्येक पद के लिए पात्र अभ्यर्थियों की उपलब्धता तथा चयन प्रक्रिया के मानकों की पर्याप्त जांच की गई है।
क्या पहले की कार्रवाई को मिलेगी स्वीकृति?
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 5 अक्टूबर की कार्य परिषद बैठक का एजेंडा है। इसमें संशोधित सामान्य भर्ती नियमावली और विज्ञापन को अनुमोदित कराने के साथ-साथ पहले की गई कार्रवाई को कार्येत्तर स्वीकृति देने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
ऐसे में अब यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है कि निदेशक पदों की भर्ती प्रक्रिया किस नियमावली के आधार पर पूरी की गई, 2023 में स्वीकृत नियमों और प्रस्तावित संशोधित नियमों में क्या अंतर है तथा साक्षात्कार और चयन प्रक्रिया के समय कौन से नियम प्रभावी थे।
जानकारों के अनुसार इन सवालों का स्पष्ट उत्तर विश्वविद्यालय के वर्ष 2023 के मूल निर्णय, प्रस्तावित संशोधित भर्ती नियमावली, जारी विज्ञापन, चयन समिति की कार्यवाही और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति से संबंधित अभिलेखों से ही सामने आ सकता है।
अब निगाहें 5 अक्टूबर को होने वाली कार्य परिषद की बैठक पर हैं। बैठक में निदेशक भर्ती प्रक्रिया को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है और उच्च न्यायालय में लंबित मामले तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के संभावित स्पष्टीकरण को किस प्रकार ध्यान में रखा जाता है, इससे भर्ती प्रक्रिया की आगे की दिशा स्पष्ट होगी।


